फेज-6 सिविल अस्पताल में 22 मार्च के जनता कर्फ्यू के बाद 23 मार्च को सुबह से ही पेशेंट्स की लाइन लग गई। ओपीडी में खुद को चेक करवाने के लिए पहले पर्चियां बनाने के लिए लाइनें लगी। जबकि अधिकतर मरीज स्टॉफ से लड़े भी क्योंकि उनको जवाब दिया जा रहा था कि चेक नहीं किया जा रहा।
यह बात सिविल सर्जन और एसएमओ के ध्यान में पहुंची तो उन्होंने हालात सामान्य करवाए। जिसके बाद उन मरीजों को चेक करने जिनको मामूली कोई न कोई बीमारी थी या परेशानी थी चेक करने के लिए ओपीडी में बैठे डॉक्टरों के रूम्स से टेबल कुर्सियां निकलवा बाहर ओपन एरिया में लगावा दी। ताकि मरीजों के पड़े रश को कंट्रोल किया जा सके और किसी को बिना चैक वापिस न भेजा जाए। जोकि निर्धारित समय पर बाहर ही चलती रही।
ओपीडी स्लिप बनाने के लिए लगी भीड़...सोमवार सुबह से ही अस्पताल में मरीजों की ओपीडी स्लीप बनाने के लिए लंबी कतारें लग गई थी और इन मरीजों ने सोशल डिस्टेंस भी मेंटेन नहीं किया। जोकि सबसे अधिक घातक है वो भी अस्पताल जैसी जगह पर जहां पर कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों का इलाज चल रहा था। जैसे ही यह अस्पताल सिविल सर्जन डॉक्टर मंजीत सिंह के संज्ञान में आई तो उन्होंने तुरंत इन मरीजों का सबसे पहले सोशल डिस्टेंस मेंटेन करवाया और उसके बाद उनकी ओपीडी स्लीप बनवाने में मदद की गई।
तीमारदारों को नहीं घुसने दिया: वहीं इस वायरस का अस्पताल में अन्य बीमारी के संबंध में चैक करवाने आए मरीजों या उनके तीमारदारों पर कोई असर न पड़े इसके लिए इन सभी को अस्पताल में जाने ही नहीं दिया। अधिकतर डॉक्टरों को उनके कमराें से निकालकर बाहर पार्किंग एरिया के पास मरीजों को चेक करना पड़ा।
एक-एक कर मरीजों को बुलाया गया फिर डाॅक्टरों ने देखा...ओपन ओपीडी में डॉक्टरों को चैक करवाने आ रहे पेशेंट्स को डॉक्टर से पहले खड़े सिक्योरिटी गार्ड पूछ लेते थे कि उनको क्या बीमारी है या प्रॉब्लम है। उसके बाद संबंधित डॉक्टर को बताकर फिर उनके पास भेजते थे। यह भी देखने को पाया गया कि अधिकतर मरीज ऐसे थे कि उनके चार अस्पताल में तीन से चार लोग चैक करवाने के लिए पंहुचे हुए थे। जबकि यह चीज गलत है। यदि कोई बीमार है तो उनके साथ एक तामीरदारी आ सकता है। मात्र पेशेंट को ही ओपीडी में चैक करने वाले डॉक्टरों के पास भेजा जा रहा था व उनके तीमारदारों को वहीं से वापिस बाहर भेजा जा रहा था।
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