Tuesday, March 24, 2020

कभी-कभी ले सकते हैं पॉजिटिव इन्फॉर्मेशन का ओवरडोज, ये हेल्दी बना सकता है...

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‘इन्फॉर्मेशन इज़ द राॅ मटेरियल’ यह भोजन की तरह हमारे अंदर जा रहा है। सूचनाएं सोच पर असर करती हैं।**

कोरोना के कारण जब सब लोग घर पर हैं तो न्यूज चैनलों में चौबीसों घंटे वायरस से जुड़ी हर खबर मिल रही है। जब इतने सारे इनपुट हमारे अंदर जा रहे हैं तो हम कुछ अलग कैसे सोच सकते हैं? आज इन्फॉर्मेशन ओवरलोड है, लेकिन क्वालिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन पर क्वेश्चन मार्क है। कभी-कभी आप पॉजिटिव इन्फॉर्मेशन का भी ओवरडोज ले सकते हैं। ये सूचना आपको हेल्दी बना सकती है, क्योंकि ये आपकी सोच पर असर करती है। हम जो खाते हैं उसके पोषक तत्व हमारे शरीर को बनाते हैं। उसी तरह सूचनाएं हमारे मन की सेहत और सोच को प्रभावित करती है। ‘इन्फॉर्मेशन इज़ द राॅ मटेरियल’ ये भी भोजन है जो हमारे अंदर जा रहा है। भोजन आपको सिर्फ सेहतमंद बनाता है लेकिन सूचनाएं हमारी सोच पर असर कर रही हैं। फिर हम कहते हैं कि निगेटिव सोचना तो नाॅर्मल है। हम पॉजिटिव कैसे सोचें? मुद्दा ये है कि हमें सोच का सोर्स ही नहीं पता है। फिलहाल आपकी सोच का सोर्स है ‘सूचना’। इसके अाधार पर ही आपकी सोच बन रही है, जिस तरह की सूचनाएं हमारे अंदर जाएंगी, उसी तरह की सोच बनेगी।

सूचना देने वालों का मकसद नेक हाेता है। वो हमें इन्फॉर्म करना चाहते हैं। ये हम पर निर्भर करता है कि हम सिर्फ सुन रहे हैं या उसके बारे में बहुत ज्यादा साेच रहे हैं। उदाहरण से समझें- मुझे पता है गाड़ी और स्कूटर बहुत ध्यान से चलाना चाहिए। चलाते भी हैं, क्योंकि हमें इन्फॉर्मेशन दी गई है कि वाे ध्यान से चलाना है। लेकिन सिर्फ एक दिन हम सिर्फ ये इन्फॉर्मेशन लें कि हर रोज कितने एक्सीडेंट हो रहे हैं। पूरे विश्व में कितने एक्सीडेंट हो रहे हैं। अब तक देश में कितने एक्सीडेंट हाे गए। अगले घंटे इस देश में कितनी डेथ हुर्इ। हमें पता है एक्सीडेंट होता है। हमें ये भी पता है कि गाड़ी कैसे चलाना है। इसके बावजूद अगर हम अपने मन में सिर्फ वही इन्फॉर्मेशन भरेंगे तो एक्सीडेंट हो या न हो अजीब-सा डर हमारे अंदर इतना भर जायेगा कि जब भी गाड़ी या स्कूटर चलाने निकलेंगे तो एक्सीडेंट की अाशंका बढ़ जाएगी।

रोज सुबह जब हम घर से निकलते हैं तब ये सोच कर गाड़ी नहीं निकालते कि कहीं एक्सीडेंट न हो जाए। फ्लाइट में बैठते वक्त ये नहीं साेचते कि कहीं प्लेन क्रैश न हो जाए। ट्रेन में बैठते वक्त ये नहीं सोचते कि ट्रेन डिरेल न हो जाए। असल जिंदगी में कभी न कभी किसी न किसी के साथ ये सब कुछ होता है। लेकिन, ये साेचिए कि फिलहाल हम सब दिनभर क्या सोच रहे हैं? यही कि कहीं हमें कोरोना न हो जाए। वजह है- इन्फॉर्मेशन। न्यूज चैनल अाैर सोशल मीडिया से हमें दिनभर इससे जुड़ी सूचना मिल रही है। सोचिए, हम सारा दिन कौन-से मैसेज भेज रहे हैं। हर दस मिनट में कोई न कोई शुभचिंतक बड़ी शुभभावना से यही मैसेज भेज रहा है कि आज करोना से इतने लोग मरे, फलां जगह भी ये वायरस फैल गया, इतने लोग प्रभावित हुए, संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है, इस स्टेट में ये हो गया। कोरोना से फलां शहर में एक और डेथ हो गई। ये सब इन्फॉर्मेशन है। तय हमें तय करना है कि ये सूचनाएं हमें लेनी हैं या नहीं। लेनी है तो कितनी।

बी.के. शिवानी

ब्रह्माकुमारी

soul search**



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